छत्तीसगढ़

बिलासपुर: 8 करोड़ के लोन केस में बड़ा उलटफेर! सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की CBI की FIR, कारोबारी को मिली बड़ी राहत

बैंक से समझौता होने के बाद आपराधिक कार्रवाई पर शीर्ष अदालत की सख्त टिप्पणी, फैसले के दूरगामी असर की चर्चा

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के एक कारोबारी को कथित बैंक धोखाधड़ी मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने न केवल सीबीआई की एफआईआर और चार्जशीट को रद्द कर दिया, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया कि बैंक और कर्जदार के बीच आपसी सहमति से विवाद का निपटारा हो जाने के बाद आपराधिक मुकदमा चलाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद बैंकिंग और कारोबारी जगत में इसकी व्यापक चर्चा हो रही है। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की खंडपीठ ने कारोबारी विजय कुमार केला की अपील स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर, सीबीआई की चार्जशीट और निचली अदालत की कार्यवाही को निरस्त कर दिया।

मामला रायपुर निवासी कारोबारी विजय कुमार केला और उनकी फर्म मेसर्स मोहन ट्रेडर्स से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार, फर्म का संचालन उनके बड़े भाई स्वर्गीय परमानंद केला करते थे। फर्म ने यूको बैंक से ऋण लिया था, जिसकी राशि वर्ष 2009 तक बढ़कर लगभग 8 करोड़ रुपये हो गई थी। ऋण के बदले रायपुर स्थित अमलीडीह और बोरियाखुर्द की संपत्तियां गिरवी रखी गई थीं।

बताया गया कि नवंबर 2009 में परमानंद केला के निधन के बाद कारोबार प्रभावित हुआ और ऋण की किश्तें जमा नहीं हो सकीं। इसके बाद बैंक ने वर्ष 2010 में खाते को एनपीए घोषित कर दिया और वसूली के लिए डेब्ट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल (डीआरटी) में मामला दायर किया।

मामला लंबित रहने के दौरान दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ और 6.49 करोड़ रुपये की बकाया राशि के बदले 4.25 करोड़ रुपये में फुल एंड फाइनल सेटलमेंट तय हो गया। इस समझौते को डीआरटी की स्वीकृति भी मिल गई और विवाद का निपटारा हो गया।

लेकिन इसके करीब ढाई साल बाद यूको बैंक के जोनल हेड ने सीबीआई में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि लोन सीमा बढ़वाने के लिए कथित तौर पर फर्जी ऑडिट रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी और बैंक के पास गिरवी रखी गई संपत्तियों के संबंध में अनियमितताएं की गई थीं। इसके आधार पर सीबीआई ने एफआईआर दर्ज कर चार्जशीट पेश कर दी थी।

कारोबारी ने पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में राहत की मांग की, लेकिन वहां से राहत नहीं मिलने पर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुनवाई के बाद शीर्ष अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि जब बैंक और कर्जदार के बीच विवाद का विधिवत निपटारा हो चुका हो और संबंधित मंच उसकी पुष्टि कर चुका हो, तब उसके बाद उसी मामले में आपराधिक कार्रवाई जारी रखना उचित नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि वाणिज्यिक विवादों के निपटारे के बाद भी आपराधिक मुकदमे चलते रहेंगे, तो इसका प्रतिकूल प्रभाव देश की आर्थिक व्यवस्था पर पड़ सकता है। इससे लोग बैंकों के साथ वन-टाइम सेटलमेंट जैसे विकल्पों को अपनाने से भी हिचक सकते हैं।

इस फैसले को बैंकिंग विवादों और आर्थिक अपराधों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांत के रूप में देखा जा रहा है, जिसके दूरगामी प्रभाव भविष्य में सामने आ सकते हैं।

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