Bihar Minister Deepak Prakash Case: बिना विधायक बने मंत्री रहने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, बिहार सरकार से मांगा जवाब
बिना विधायक या विधान परिषद सदस्य बने मंत्री पद पर बने रहने को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब; जानिए संविधान का क्या है प्रावधान

नई दिल्ली। बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश के मंत्री पद को लेकर दायर याचिका पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार सरकार से अहम सवाल पूछा कि आखिर कोई व्यक्ति बिना विधायक या विधान परिषद सदस्य बने छह महीने से अधिक समय तक मंत्री पद पर कैसे बना रह सकता है?
यह मामला संविधान के अनुच्छेद 164(4) की व्याख्या से जुड़ा है और इस पर अब सुप्रीम कोर्ट की नजर है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या पूछा?
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि यह पूरी तरह कानून की व्याख्या से जुड़ा मामला है। कोर्ट ने बिहार सरकार से स्पष्ट करने को कहा कि यदि कोई व्यक्ति निर्वाचित नहीं है, तो वह छह महीने से अधिक समय तक मंत्री पद पर किस आधार पर बना हुआ है।
क्या है याचिकाकर्ता का तर्क?
याचिकाकर्ता का कहना है कि दीपक प्रकाश न तो विधानसभा के सदस्य हैं और न ही विधान परिषद के। संविधान के तहत गैर-विधायक को मंत्री बनने के बाद केवल छह महीने के भीतर किसी सदन का सदस्य बनना होता है।
याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि क्या कोई मंत्री छह महीने की अवधि पूरी होने से पहले पद छोड़कर, नई सरकार बनने पर दोबारा शपथ लेकर छह महीने की समय-सीमा को फिर से शुरू (रीसेट) कर सकता है?
क्यों उठा विवाद?
याचिका के अनुसार, दीपक प्रकाश ने नीतीश कुमार सरकार में करीब 4 महीने 26 दिन तक पंचायती राज मंत्री के रूप में कार्य किया। इसके बाद सरकार बदलने पर उनका कार्यकाल समाप्त हो गया।
करीब 22 दिन बाद, सम्राट चौधरी सरकार के गठन के बाद उन्हें फिर से मंत्री पद की शपथ दिलाई गई, जबकि वे तब भी किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे।
याचिकाकर्ता का दावा है कि यदि दोनों कार्यकाल को जोड़कर देखा जाए तो उनका कुल मंत्री कार्यकाल छह महीने से अधिक हो चुका है।
संविधान क्या कहता है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अनुसार, यदि किसी ऐसे व्यक्ति को मंत्री बनाया जाता है जो विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है, तो उसे छह महीने के भीतर किसी सदन का सदस्य बनना अनिवार्य होता है। यदि वह ऐसा नहीं कर पाता, तो उसे मंत्री पद छोड़ना पड़ता है।
अब सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना होगा कि सरकार बदलने के बाद दोबारा मंत्री बनाए जाने की स्थिति में छह महीने की अवधि नए सिरे से शुरू मानी जाएगी या पहले के कार्यकाल को भी इसमें जोड़ा जाएगा।
