फेसबुक पोस्ट पड़ी भारी! सेना पर टिप्पणी करने वाले CISF जवान को हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत, सजा बरकरार
भारतीय सेना और अर्द्धसैनिक बलों पर आपत्तिजनक पोस्ट मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, वेतन कटौती की सजा को बताया उचित

बिलासपुर: भारतीय सेना और अर्द्धसैनिक बलों के खिलाफ फेसबुक पर कथित आपत्तिजनक पोस्ट करना एक CISF कांस्टेबल को महंगा पड़ गया। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने विभागीय कार्रवाई को सही ठहराते हुए कांस्टेबल की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने एक वर्ष तक वेतन में एक स्टेज की कटौती की सजा को उचित बताते हुए कहा कि मामले में न्यायिक हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।
विभागीय सजा को दी थी चुनौती
याचिकाकर्ता CISF कांस्टेबल ने अनुशासनात्मक और अपीलीय प्राधिकरण के उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें एक साल के लिए वेतन में एक स्टेज की कटौती (संचयी प्रभाव के साथ) की सजा दी गई थी।
कांस्टेबल का दावा था कि उसका भारतीय सेना या अर्द्धसैनिक बलों का अपमान करने का कोई इरादा नहीं था। उसने यह भी कहा कि विभाग यह साबित नहीं कर पाया कि विवादित फेसबुक पोस्ट उसी ने अपलोड किए थे। साथ ही उसने आरोप लगाया कि विभागीय जांच के दौरान उसे अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर नहीं दिया गया।
कोर्ट ने माना- जांच प्रक्रिया में नहीं हुई कोई गड़बड़ी
विभाग की ओर से अदालत को बताया गया कि 23 और 24 जून 2020 को कांस्टेबल के फेसबुक अकाउंट से भारतीय सेना और पैरामिलिट्री फोर्स के खिलाफ पांच आपत्तिजनक पोस्ट साझा किए गए थे। इसके बाद सभी नियमों का पालन करते हुए विभागीय जांच की गई।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता जांच प्रक्रिया में शामिल हुआ था और उसे अपना बचाव रखने का पर्याप्त अवसर भी दिया गया था।
हाईकोर्ट की दो टूक- सजा पूरी तरह उचित
अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत वह तभी हस्तक्षेप कर सकती है, जब जांच प्रक्रिया में गंभीर त्रुटि, प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन या अत्यधिक एवं अनुचित सजा का मामला हो। इस प्रकरण में ऐसा कोई आधार सामने नहीं आया।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय सेना और अर्द्धसैनिक बलों के खिलाफ आपत्तिजनक सोशल मीडिया पोस्ट करना गंभीर अनुशासनहीनता है। ऐसे में वेतन में एक स्तर की कटौती जैसी सजा न तो अत्यधिक है और न ही अनुचित।
याचिका हुई खारिज
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने विभागीय कार्रवाई को वैध ठहराते हुए CISF कांस्टेबल की याचिका खारिज कर दी। अदालत के इस फैसले से स्पष्ट हो गया कि सुरक्षा बलों के कर्मियों के लिए सोशल मीडिया पर अनुशासन और जिम्मेदारी का पालन करना अनिवार्य है।


