छत्तीसगढ़

ओडिशा-छत्तीसगढ़ में जल बंटवारे पर सहमति के आसार, न्यायाधिकरण ने बातचीत के लिए बढ़ाया समय

गभग एक दशक से चले आ रहे महानदी जल विवाद को सुलझाने की दिशा में सकारात्मक पहल हुई है। ओडिशा और छत्तीसगढ़ ने इस विवाद का समाधान आपसी सहमति से निकालने पर सहमति जताई है। इस परिप्रेक्ष्य में महानदी जल विवाद ट्राइब्यूनल ने दोनों राज्यों को बातचीत का मौका देने के लिए और समय दे दिया है।
शनिवार को हुई सुनवाई के दौरान ट्राइब्यूनल की अध्यक्ष न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी ने दोनों राज्यों की ओर से आई सहमति और पत्राचार को संज्ञान में लिया। ट्राइब्यूनल ने निर्देश दिया कि अगली सुनवाई के दिन यानी 6 सितंबर को दोनों राज्यों के संबंधित सचिव ट्राइब्यूनल के समक्ष मौजूद रहें और बातचीत की प्रगति की जानकारी दें।

मुख्यमंत्रियों के स्तर पर हो रही है पहल
ओडिशा के एडवोकेट जनरल पितांबर आचार्य ने ट्राइब्यूनल को बताया कि मुख्यमंत्री मोहन चरण मांझी ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को एक पत्र भेजकर विवाद का शांतिपूर्ण समाधान सुझाया है। जवाब में साय ने भी सहमति जताते हुए कहा है कि यह मामला उनके विचाराधीन है और वह समाधान के लिए तैयार हैं। बताया गया कि दोनों राज्यों के बीच उच्चस्तरीय बैठकें हुई हैं और सकारात्मक माहौल बना है।

एक दशक पुराना विवाद, अब सुलझने की उम्मीद

महानदी जल विवाद तब शुरू हुआ जब ओडिशा ने आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़ ने ऊपर की ओर बांध और बैराज बनाकर पानी का प्रवाह रोक दिया, जिससे ओडिशा के निचले इलाकों में कृषि और पेयजल संकट पैदा हुआ। 2016 में ओडिशा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था और फिर 2018 में केंद्र सरकार ने ट्राइब्यूनल का गठन किया। लेकिन छह साल की सुनवाई में अब तक एक ही गवाह की जिरह हुई है।

राजनीतिक समाधान की तरफ बढ़ता मामला
एडवोकेट जनरल आचार्य ने कहा कि अब तक भारत में कोई भी अंतर-राज्यीय जल विवाद पूरी तरह ट्राइब्यूनल के जरिए नहीं सुलझा है। इसलिए राजनीतिक स्तर पर संवाद ही सही रास्ता हो सकता है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री से भी संपर्क किया गया है और दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री इस मुद्दे को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने के पक्ष में हैं।

महानदी जल विवाद एक लंबे समय से चला आ रहा संकट रहा है, लेकिन हाल की घटनाएं इस ओर इशारा कर रही हैं कि अब इस मुद्दे को आपसी बातचीत से सुलझाया जा सकता है। ट्राइब्यूनल की अनुमति और राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ अब यह विवाद एक स्थायी समाधान की दिशा में अग्रसर हो सकता है।

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