छत्तीसगढ़

75 दिन तक चलता है ये अनोखा दशहरा! रावण नहीं, यहां निभाई जाती है सदियों पुरानी रहस्यमयी परंपरा; UNESCO तक पहुंचाने की तैयारी

बस्तर दशहरा 2026 की तैयारियां तेज, समिति की बैठक में 1.21 करोड़ का बजट प्रस्तावित; बलराम मांझी बने नए उपाध्यक्ष

रायपुर, 8 सितंबर 2026: दशहरा का नाम सुनते ही आमतौर पर एक दिन के उत्सव और रावण दहन की तस्वीर सामने आती है, लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरा की कहानी बिल्कुल अलग है। यहां यह पर्व एक-दो दिन नहीं, बल्कि पूरे 75 दिनों तक चलता है और इसकी परंपराएं सदियों पुरानी हैं।

विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा 2026 को इस बार भी आस्था, परंपरा और भव्यता के साथ मनाने की तैयारी शुरू हो गई है। पर्व की पूजा विधि, सुरक्षा, स्वच्छता, वित्तीय प्रबंधन और विभिन्न आयोजनों को लेकर बस्तर दशहरा समिति की महत्वपूर्ण बैठक कलेक्टोरेट के प्रेरणा कक्ष में हुई।

बैठक की अध्यक्षता बस्तर सांसद एवं दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप ने की।

यहां दशहरा सिर्फ त्योहार नहीं, सदियों की जीवित परंपरा है

बस्तर दशहरा की सबसे खास पहचान इसकी लंबी अवधि और अनूठी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराएं हैं।

बैठक में बस्तर राजपरिवार के कमलचंद भंजदेव ने पर्व की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह परंपरा वर्ष 1423 से निरंतर चली आ रही है।

उन्होंने इसे मैसूर और कुल्लू दशहरा से भी प्राचीन बताया और कहा कि बस्तर दशहरा को यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए सामूहिक प्रयास किए जाने चाहिए।

यही वजह है कि बस्तर दशहरा को सिर्फ धार्मिक आयोजन के बजाय एक ऐसी जीवंत सांस्कृतिक परंपरा के रूप में देखा जाता है, जिसमें स्थानीय समाज, देवी-देवता, राजपरिवार और प्रशासन की भूमिका जुड़ी हुई है।

दशहरा समिति को मिला नया उपाध्यक्ष

बैठक में बस्तर दशहरा समिति के उपाध्यक्ष पद के लिए निर्वाचन भी कराया गया।

बचेली परगना के बीरो मांझी ने अर्जुन मांझी के नाम का प्रस्ताव रखा, जबकि सोनाबाल परगना के समुन्द मांझी ने बलराम मांझी के नाम का प्रस्ताव किया।

हाथ उठाकर मतदान कराया गया, जिसमें स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद बलराम मांझी को समिति का नया उपाध्यक्ष घोषित किया गया।

नवनिर्वाचित उपाध्यक्ष ने देवसराय सहित अन्य महत्वपूर्ण स्थलों की व्यवस्थाओं को और बेहतर बनाने से जुड़े सुझाव भी दिए।

1.21 करोड़ रुपये का बजट, तैयारियों पर जोर

बैठक में दशहरा समिति के सचिव एवं तहसीलदार ने पर्व के लिए 1 करोड़ 21 लाख रुपये का बजट प्रस्तावित किया।

इस राशि के तहत पर्व के दौरान होने वाले विभिन्न पूजा विधानों और उनसे जुड़ी व्यवस्थाओं पर चर्चा की गई।

पूजा स्थलों, मार्गों, देवस्थलों, पेयजल, प्रकाश, स्वच्छता, सुरक्षा और श्रद्धालुओं की सुविधा को लेकर भी व्यापक मंथन हुआ।

एनएमडीसी से हर साल डेढ़ करोड़ की मांग

दशहरा समिति के अध्यक्ष एवं सांसद महेश कश्यप ने पर्व की व्यवस्थाओं को मजबूत करने के लिए एनएमडीसी प्रबंधन से CSR मद में हर वर्ष कम से कम डेढ़ करोड़ रुपये की स्थायी वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की मांग करने की बात कही।

उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए केंद्रीय मंत्रियों से भी सकारात्मक चर्चा हुई है।

उन्होंने पर्व की मौलिकता और पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखने पर जोर दिया।

मावली परघाव से देवस्थलों तक खास इंतजाम

बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव ने मावली परघाव के दौरान संबंधित स्थलों और मार्गों की विशेष साफ-सफाई कराने की जरूरत बताई।

उन्होंने देवी-देवताओं और आंगा देव के सम्मानपूर्वक आगमन के लिए समुचित व्यवस्था करने पर जोर दिया।

साथ ही मांझी-चालकी से पर्व के दौरान पारंपरिक वेशभूषा और पगड़ी धारण करने का आग्रह किया गया।

मेंबर-मेंबरीन की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए उनके मासिक मानदेय में वृद्धि का प्रस्ताव भी समिति के सामने रखा गया।

सुरक्षा से लेकर ट्रैफिक तक प्रशासन अलर्ट

बस्तर कलेक्टर आकाश छिकारा और पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा ने पर्व को शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित तरीके से संपन्न कराने के लिए विभागों के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया।

प्रमुख पूजा स्थलों पर व्यवस्थाएं समय पर पूरी करने के साथ सुरक्षा और यातायात प्रबंधन को प्रभावी बनाने की बात कही गई।

समिति की बैठक में मांझी-चालकी, पुजारी, मेंबर-मेंबरीन और अन्य सदस्यों ने भी पूजा विधान एवं आयोजन से जुड़े सुझाव दिए।

अब नजर UNESCO की ओर

75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा अपनी परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और जनभागीदारी के कारण देश-दुनिया में अलग पहचान रखता है।

अब समिति और बस्तर राजपरिवार की कोशिश इसे यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर सूची तक पहुंचाने की है।

अगर यह प्रयास सफल होता है, तो बस्तर की सदियों पुरानी परंपरा को अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक मंच पर नई पहचान मिल सकती है।

यानी इस बार बस्तर दशहरा सिर्फ उत्सव नहीं होगा—इसके साथ अपनी सदियों पुरानी विरासत को दुनिया के सामने और मजबूती से रखने की एक बड़ी कोशिश भी जुड़ी होगी।

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