देश

आंकड़ों ने खोली डराने वाली सच्चाई! बेटियां बढ़ीं जरूर, लेकिन देश के कई जिलों में ‘गायब’ हो रही हैं लड़कियां

हरियाणा के कुछ जिलों में हालात इतने खराब कि 1000 लड़कों पर 800 से भी कम बेटियां, नए आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता

नई दिल्ली।

भारत में बेटियों की संख्या बढ़ने की खबर पहली नजर में राहत देती है, लेकिन इसके पीछे छिपी सच्चाई अब भी डराने वाली है। देश में जन्म के समय लिंगानुपात में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन हालात अभी भी सामान्य से काफी दूर हैं। ताजा सरकारी आंकड़ों ने यह साफ कर दिया है कि बेटियों को लेकर सोच बदलने के दावे अभी अधूरे हैं।

सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2022 से 2024 के बीच देश में जन्म के समय लिंगानुपात 1000 लड़कों पर 918 लड़कियां दर्ज किया गया। यह आंकड़ा साल 2015-17 के सबसे खराब स्तर 896 से बेहतर जरूर है, लेकिन विशेषज्ञ इसे अब भी चिंता का संकेत मान रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सुधार के बावजूद हालात सामान्य क्यों नहीं हो पा रहे। विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO के मुताबिक, प्राकृतिक परिस्थितियों में 1000 लड़कों पर करीब 952 लड़कियां जन्म लेनी चाहिए। यानी भारत अब भी उस सामान्य स्तर से काफी नीचे चल रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जन्म के समय लड़कों की संख्या थोड़ा ज्यादा होना सामान्य जैविक प्रक्रिया है, क्योंकि नवजात लड़के अपेक्षाकृत अधिक कमजोर माने जाते हैं। लेकिन जब यह अंतर बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, तो यह समाज में गहरे बैठे लैंगिक भेदभाव और भ्रूण लिंग चयन जैसी चिंताओं की तरफ इशारा करता है।

रिपोर्ट में सबसे ज्यादा चिंता हरियाणा के आंकड़ों को लेकर जताई गई है। राज्य के कई जिलों में हालात बेहद खराब बताए गए हैं। कुछ जिलों में तो 1000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या 900 से भी नीचे पहुंच गई है। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा चरखी दादरी से सामने आया, जहां यह संख्या सिर्फ 768 दर्ज की गई।

इसके अलावा यमुनानगर, नारनौल, सिरसा, गुरुग्राम, हिसार, जींद, कैथल, झज्जर, भिवानी, रोहतक, पानीपत और फतेहाबाद जैसे जिलों में भी लिंगानुपात बेहद खराब स्थिति में पहुंच चुका है।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि एक समय जिन शहरी इलाकों को भ्रूण लिंग चयन के लिए ज्यादा जिम्मेदार माना जाता था, वहां अब हालात ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में बेहतर दिख रहे हैं। यानी अब चिंता का केंद्र गांव बनते जा रहे हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, जन्म के समय लिंगानुपात यानी Sex Ratio at Birth और बाल लिंगानुपात को अलग-अलग समझना जरूरी है। SRB केवल जन्म के समय लड़के-लड़कियों का अनुपात बताता है, जबकि बाल लिंगानुपात बच्चों के जीवित रहने और उनकी स्थिति को भी दर्शाता है।

हालांकि सरकार और सामाजिक संगठनों की कोशिशों से कुछ सुधार जरूर दिखा है, लेकिन आंकड़े साफ बता रहे हैं कि देश अभी उस मानसिकता से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाया है, जहां बेटियों को बराबरी का दर्जा मिल सके। अब सवाल यही है कि क्या आने वाले वर्षों में यह अंतर और घटेगा, या फिर बेटियों के नाम पर चल रहे अभियान सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएंगे।

Related Articles

Back to top button