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उत्तराखंड में बादल फटने से कहर: क्या प्रकृति से छेड़छाड़ और अफसरशाही की लापरवाही बनी वजह?

नई दिल्‍ली। उत्तराखंड से आपदा की ऐसी तस्वीर फिर सामने आई है, जहां अचानक कुछ ही सेकंड के भीतर हालात ऐसे बदल जाएंगे, यह मालूम नहीं था। कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि चंद सेकंड और इतना भयावह दृश्य सामने प्रस्तुत हो जाएगा, लेकिन क्या सब दोष प्रकृति का ही है?

क्या प्रकृति ने हमें छला या हम उससे अधिक चतुर बन रहे थे। बहुत से सवाल उठे हैं। कारण बताया गया कि बादल फट गया।

सामान्यतया बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदा पर किसी का बस नहीं है, लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि बादल क्यों फटा? इतनी डीजल पेट्रोल की गाड़ियां पहाड़ों की सुरम्य वादियों में लगातार दौड़ रही हैं, निरंतर पेड़ों की बलि ली जा रही है, प्रकृति को संरक्षित करने वाले वृक्ष लगाने की गति इतनी धीमी है, क्या इन बातों पर किसी का ध्यान नहीं गया? बिल्कुल गया होगा, लेकिन इसकी उपेक्षा हुई है और प्रकृति ने अपना स्थान व रूप वापस मांगने के लिए रौद्र रूप दिखा दिया।

अब बात प्रशासन की। पर्यावरण, भूगर्भीय आकलन, पारिस्थितिकी संतुलन और जलवायु जैसी गंभीर मुद्दों पर सरकार का ध्यान है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है तो फिर क्या कारण है कि अधिकारी वर्ग के साथ होने वाली बैठकों के बाद विशेषज्ञों और विज्ञानियों की सलाह एवं चेतावनियों पर न तो ध्यान दिया जा रहा है, और न ही उनकी सलाह मानी जा रही है।

विज्ञानियों और विशेषज्ञों की राय को सिरे से खारिज करने का आरोप क्यों बार-बार घूम-फिर कर अफसरशाही की तरफ ही इशारा कर रहा है, यह पहाड़ों ने बता दिया।

नियमों-कानूनों की अनदेखी

इस बीच उत्तराखंड में अनेक जगहों पर हो रहे निर्माणकार्यों के दौरान नियमों-कानूनों की घोर अनदेखी की जा रही है। पहाड़ों पर आवास आदि के रूप में पहले जिस तरह की संरचना का निर्माण किया जाता था, वह पहाड़ों के अनुकूल था, लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है। ऐसे में सवाल यह भी है कि इन निर्माणकार्यों के नक्शे कैसे पास हो रहे हैं? नुकेले पहाड़ और नदी की धारा पर होटल कौन बनाने की अनुमति देता है?

व्यू के चक्कर में स्थानीय निवासी मारा जा रहा है या फिर उसे लालच देकर जमीन से हटाया जा रहा है। ढलवां मकानों की जगह भारी भरकम टाइल्स लगे सीमेंट के जंगल रातोंरात तो बने नहीं। तो फिर सवाल है कि स्थानीय प्रशासन आंख मूंद कर कैसे बैठा है? आखिर पहले की घटनाओं से हम क्यों नहीं सबक ले पा रहे हैं? पहाड़ को बचाना सबसे गंभीर चुनौती है।

पहाड़ों का दोहन

उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड में विभिन्न जल विद्युत परियोजनाओं पर काम चल रहा है। वहीं पंचेश्वर बांध बनाए जाने का मामला भी विचाराधीन है। इस बांध की ऊंचाई तीन सौ मीटर के आसपास बताई गई है। इस बांध में छह सुरंग, दो पावरहाउस और चार टरबाइन बनाए जा सकते हैं।

ऐसे में क्या इस तरफ ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए कि पंचेश्वर परियोजना से कच्चे पहाड़ों में अति तीव्र गति से किए जाने वाले विकास कार्यों को पचाने की क्षमता कितनी है? है भी या नहीं है?

समझना होगा कि पहाड़ों और मैदानों में अंतर है, सीमेंट और टाइल्स के जंगल कहीं पहाड़ ही न लील जाएं। मैदान जैसे घर चाहिए तो पहाड़ ही समतल न हो जाएं। स्थानीय आदमी जब तक जागृत नहीं होगा, ये आपदाएं मुंह खोल कर खड़ी रहेंगी। चाहे वह होटल निर्माण हो या निजी आवास।

पहाड़ों पर पड़ने वाले बोझ को कम करना ही होगा। पहाड़ों की जैसी सरल जीवन शैली थी, उसे विस्मृत करना अनिष्टकारी साबित हो सकता है। पर्वतीय अंचल को वैसे ही रहने दें और स्वयं को उसमें ढाल कर चलें तो पर्वत और मानव का संबंध लंबे समय तक चलेगा, वरना भविष्य की आपदाओं की आहट हम आप सुन रहे हैं।

क्‍या पहाड़ पर मकान बनाना नहीं है सेफ?

चार-पांच मंजिल के भवनों के बजाय ढलवां छतों के साथ पहाड़ी नक्शे और वास्तुकला ही पहाड़ को पहाड़ी अंचल बनाती है, वरना ईंट, सीमेंट और टाइल्स के जंगल से तो शहर भरे पड़े हैं। ध्यान रहे, हर प्रदेश की भौगोलिक स्थिति अलग-अलग होती है, दिल्ली-मुंबई जैसी गगनचुंबी इमारतें विश्व के किसी भी पहाड़ी राज्य में नहीं हैं।

देश के किसी और राज्य की तुलना अगर उत्तराखंड से करें तो बिल्कुल पड़ोसी पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश ने अपने भू-कानून को पूरी तरह से लागू किया और अनावश्यक हस्तक्षेप से अपने को बचा कर रखा। विकास के कार्य हुए, लेकिन राज्य की जागरूक जनता ने सरकार के साथ मिलकर काम किए हैं।

पूर्वोत्तर के राज्यों ने पहाड़ी क्षेत्रों में अपनी पहचान को स्थापित किया है और अंधाधुंध दोहन से बचे हुए हैं। बेतरतीब निर्माण से पूर्वोत्तर के अरुणाचल, सिक्किम, मिजोरम आदि राज्यों ने दूरी बना रखी है। इसका लाभ यह हुआ है कि अपनी पहचान, वास्तुकला और शिल्प तथा स्थापत्य कला की झलक सभी जगह दिखाई देती है।

गैर पहाड़ी राज्यों की बात करें तो केरल हो या तमिलनाडु या फिर कर्नाटक, सभी ने अपनी भवन निर्माण कला को सुरक्षित रखा है। पहाड़ी राज्यों के लिए भौगोलिक परिस्थिति, आंचलिक परिवेश और भूगर्भीय अध्ययन तथा सर्वेक्षण की कहीं अधिक आवश्यक जानकारी उपलब्ध करनी होती है, क्योंकि यही चूक विपत्ति का कारण बनती है।

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