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जंगलमहल के आदिवासी नेता से बंगाल में बीजेपी की पहली सरकार में मंत्री पद का सफर, जानिए कौन हैं खुदीराम टुडू

 नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में पहली बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार बन गई है। सुवेंदु अधिकारी ने बंगाल के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है।

शपथग्रहण के दौरान सुवेंदु अधिकारी के साथ पांच अन्य मंत्रियों ने भी शपथ ली।

वहीं मंत्री पद की शपथ लेने आए खुदीराम टुडू, सुवेंदु अधिकारी के मंत्रिमंडल में एक प्रमुख आदिवासी चेहरे के तौर पर उभरे हैं।

कौन हैं खुदीराम टुडू?

खुदीराम टुडू वो शख्स हैं, जो जंगलमहल के जंगलों से निकलकर पश्चिम बंगाल की राजनीति की मुख्य धारा में आ गए हैं। भारतीय जनता पार्टी ने फिर एक बार एक ऐसे शख्स को मंत्री पद में जगह दी है, जो कि बहुचर्चित नाम नहीं हैं।

कोलकाता में हुए शपथग्रहण के दौरान सुवेंदु अधिकारी के सीएम पद की शपथ लेने के बाद खुदीराम टुडू ने वरिष्ठ BJP नेताओं दिलीप घोष, अग्निमित्रा पॉल, अशोक कीर्तनिया और युवा नेता निसिथ प्रमाणिक के साथ मंत्री पद की शपथ ली।

खुदीराम टुडू ने इस बार के विधानसभा चुनाव 2026 में बांकुरा जिले की रानीबंध सीट से 52 हजार से ज्यादा वोटों से जीत हासिल की और बीजेपी ने उन्हें पश्चिम बंगाल सरकार की पहली कतार में खड़ा कर दिया।

खुदीराम टुडू के चुनावी हलफनामे के मुताबिक वे ग्रेजुएट हैं और उनके पास करीब 23 लाख रुपये की संपत्ति है। इनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है।

BJP ने आदिवासी समाज को साधा

खुदीराम टुडू ने बंगाल के प्रमुख आदिवासी निर्वाचन क्षेत्र में तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार को हराया। उनकी जीत को जंगलमहल क्षेत्र में BJP के मजबूत प्रदर्शन का हिस्सा माना जा रहा है, जहां पार्टी ने विधानसभा चुनाव 2026 के दौरान आदिवासी मतदाताओं के बीच अपनी गहरी पैठ बनाई।

टुडू रानीबांध निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह आदिवासी-बहुल बांकुरा क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट है, जो बंगाल के चुनावों में लंबे समय से राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रही है।

खुदीराम टुडू को पश्चिम बंगाल सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल करके बीजेपी ने राज्य में अपने आदिवासी संपर्क को मजबूत करने का प्रयास किया है।

बंगाल मंत्रिमंडल में खुदीराम टुडू की मौजूदगी आदिवासी प्रतिनिधित्व के राजनीतिक महत्व को दर्शाती है। यह विशेष रूप से जंगलमहल में BJP के आक्रामक अभियान के बाद और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जिसका मुख्य जोर कल्याणकारी योजनाओं के वितरण, आदिवासी पहचान और पिछली तृणमूल कांग्रेस सरकार के तहत उपेक्षा के आरोपों पर था।

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