17 साल बाद पलटा फैसला!… रिश्वत केस में सजा पाए BSNL अधिकारी को हाईकोर्ट ने किया बरी
CBI की कार्रवाई पर उठे सवाल, अदालत बोली— “सिर्फ रकम की बरामदगी से साबित नहीं होती रिश्वत”

बिलासपुर। करीब 17 साल पुराने चर्चित रिश्वत मामले में बड़ा कानूनी मोड़ आया है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा वर्ष 2007 में सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए पूर्व बीएसएनएल सब-डिविजनल ऑफिसर संजय कुमार शर्मा को दोषमुक्त कर दिया है।
एकलपीठ में सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति रजनी दुबे ने साफ कहा कि केवल पैसे की बरामदगी किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है, जब तक यह साबित न हो कि आरोपी ने रिश्वत की मांग की थी।
💰 40 हजार की बरामदगी… 80 हजार की मांग का आरोप
मामला 20 जून 2003 का है। सीबीआई के अनुसार, बिलासपुर में पदस्थ बीएसएनएल के एसडीओ संजय कुमार शर्मा को 40 हजार रुपये लेते हुए पकड़ा गया था। आरोप था कि उन्होंने अक्षय कंस्ट्रक्शन के संचालक और ठेकेदार के.पी. अग्रवाल से लंबित बिलों के भुगतान के एवज में 80 हजार रुपये की मांग की थी। बरामद रकम को रिश्वत की पहली किस्त बताया गया था।
विशेष सीबीआई अदालत ने वर्ष 2007 में उन्हें दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।
🧾 गवाही कमजोर, मांग साबित नहीं
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी कि शिकायतकर्ता के.पी. अग्रवाल का ट्रायल के दौरान निधन हो गया था, जिससे उनका प्रतिपरीक्षण (क्रॉस-एग्जामिनेशन) नहीं हो सका। अदालत ने माना कि बिना प्रतिपरीक्षण के गवाही की कानूनी मजबूती कमजोर हो जाती है।
इसके अलावा शिकायतकर्ता के पुत्र उमेश अग्रवाल और अन्य गवाहों ने भी अभियोजन का समर्थन नहीं किया। एक अन्य ठेकेदार सूर्यदेव दुबे की गवाही भी रिश्वत की मांग को स्पष्ट रूप से साबित नहीं कर सकी।
अदालत ने कहा कि गवाहों ने न तो रिश्वत की बातचीत सुनी और न ही मांग होते देखा। ऐसे में केवल रकम की बरामदगी के आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता।
🔎 फैसला क्यों अहम?
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिश्वत के मामलों में ‘मांग’ और ‘स्वीकार’ दोनों के ठोस प्रमाण आवश्यक हैं। संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाना चाहिए।
इसी आधार पर वर्ष 2007 की सजा को निरस्त करते हुए संजय कुमार शर्मा को बरी कर दिया गया।
